ई-अटेंडेंस व्यवस्था की अव्यावहारिकता: शिक्षकों के दृष्टिकोण से एक ज़मीनी विश्लेषण
1. शिक्षकों के दैनिक कार्य और शिक्षण पर असर (कीमती समय की बर्बादी)
-
मूल कार्य (पठन-पाठन) से भटकाव:
एक शिक्षक का सर्वोपरि दायित्व छात्रों को पढ़ाना, कमजोर बच्चों पर ध्यान देना और स्कूल की शैक्षणिक गुणवत्ता को सुधारना होता है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में स्कूल पहुंचते ही शिक्षक का पहला आधा घंटा मोबाइल ऐप खोलने, जीपीएस लोकेशन सेट करने और कैमरे के सामने खड़े होकर फोटो अपलोड करने की जुगत में बीत जाता है। यह बहुमूल्य समय सीधे तौर पर बच्चों की पढ़ाई से चोरी हो रहा है।
-
सुबह की प्रशासनिक आपाधापी का दबाव:
विभाग का नियम है कि स्कूल खुलने के ठीक 10 या 15 मिनट के भीतर हाज़िरी लग जानी चाहिए। सुबह-सुबह जब प्रार्थना सभा का समय होता है, जब बच्चों को कतार में खड़ा कर उन्हें नैतिक शिक्षा देनी होती है, उस वक्त शिक्षक का पूरा ध्यान अपने मोबाइल की स्क्रीन पर अटका रहता है। इस प्रशासनिक समय-सीमा के चक्कर में सुबह का जो एक सकारात्मक माहौल क्लास में होना चाहिए, वह पूरी तरह गायब हो जाता है।
-
ग्रामीण और पहाड़ी अंचलों में दोहरी मार:
दूर-दराज के नदी-नालों, जंगलों या पहाड़ी इलाकों में स्थित स्कूलों की स्थिति तो और भी बदतर है। वहां शिक्षक स्कूल के गेट पर खड़ा होने के बजाय किसी ऊंचे टीले, पेड़ के नीचे या छत के कोने पर मोबाइल लेकर नेटवर्क ढूंढता नजर आता है। ऐसे में स्कूल का पहला कालखंड इसी जद्दोजहद की भेंट चढ़ जाता है।
2. बुनियादी तकनीकी बाधाएं और सिस्टम की असफलता
-
कानून-व्यवस्था और इंटरनेट मंदी की स्थिति:
कई बार स्थानीय स्तर पर कानून-व्यवस्था बिगड़ने, परीक्षाओं के आयोजन या अन्य प्रशासनिक कारणों से सरकार द्वारा इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी जाती हैं। ऐसी स्थिति में ई-अटेंडेंस का सर्वर पूरी तरह ठप हो जाता है। शिक्षक स्कूल में समय पर आकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कर पाता, जिससे बाद में उसे मानदेय या आकस्मिक अवकाश (CL) का नुकसान उठाना पड़ता है।
-
स्थानीय नेटवर्क और टावर की खराबी:
ग्रामीण इलाकों में बिजली गुल होना या मोबाइल टावरों में तकनीकी खराबी आना एक आम बात है। कई-कई दिनों तक सिग्नल गायब रहते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के पास कोई वैकल्पिक 'ऑफलाइन' पुख्ता चैनल नहीं होता, जिसका सीधा खामियाजा शिक्षक को भुगतना पड़ता है।
-
विभागीय ऐप्स की लगातार तकनीकी खामियां (Bugs):
सरकारी विभागों द्वारा जो भी अटेंडेंस ऐप तैयार किए जाते हैं, उनका सर्वर एक साथ हजारों शिक्षकों का लोड नहीं संभाल पाता। सुबह 10 बजे जैसे ही सभी शिक्षक एक साथ लॉगिन करते हैं, ऐप क्रैश हो जाता है या 'सर्वर नॉट रिस्पॉन्डिंग' का एरर दिखाने लगता है। कई बार नया अपडेट आने के बाद ऐप पुराने फोन में चलना ही बंद हो जाता है।
3. शिक्षकों की मनोस्थिति और उसका छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव
-
अविश्वास का माहौल और आत्म-सम्मान को ठेस:
ई-अटेंडेंस व्यवस्था के पीछे कहीं न कहीं यह सोच काम कर रही है कि शिक्षक बिना सख्त निगरानी के काम नहीं करना चाहते। समाज का निर्माता कहे जाने वाले राष्ट्र-निर्माता शिक्षकों पर इस तरह का अविश्वास उनके आत्म-सम्मान को गहरी ठेस पहुंचाता है। एक शिक्षक को लगता है कि उसकी ईमानदारी को सिर्फ एक मशीन (GPS) के जरिए आंका जा रहा है।
-
मानसिक तनाव का सीधा असर बच्चों पर:
यदि तकनीकी कारणों से किसी शिक्षक की अटेंडेंस दो-तीन दिन लगातार रिजेक्ट हो जाए, तो वह पूरे दिन क्लास में तनाव में रहता है। एक अशांत और डरा हुआ शिक्षक कभी भी बच्चों को खुलकर और खुशनुमा माहौल में नहीं पढ़ा सकता। इसका सीधा नुकसान अंततः निर्दोष छात्रों को ही उठाना पड़ता है।
-
अकारण वेतन कटौती और स्पष्टीकरण का खौफ:
पोर्टल पर अनुपस्थिति दर्ज होने पर उच्च अधिकारियों द्वारा बिना जमीनी हकीकत जाने सीधे 'वेतन काटने' या 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की धमकी दी जाती है। इस कागज़ी कार्रवाई के डर से शिक्षक शैक्षणिक नवाचार करने के बजाय सिर्फ अपनी नौकरी बचाने के फेर में लगा रहता है।
4. संसाधनों की कमी और अतिरिक्त आर्थिक बोझ
-
महंगे स्मार्टफोन खरीदने की मजबूरी:
सरकारी ऐप्स केवल नवीनतम एंड्रॉइड वर्जन और अच्छे कैमरे वाले फोन में ही काम करते हैं। विभाग ने इसके लिए कोई सरकारी टैबलेट या मोबाइल उपलब्ध नहीं कराया है। कई वरिष्ठ शिक्षक जो कीपैड फोन का इस्तेमाल करते थे या तकनीकी रूप से फ्रेंडली नहीं हैं, उन्हें अपनी जेब से हजारों रुपए खर्च कर नया स्मार्टफोन खरीदना पड़ा है।
-
निजी इंटरनेट डेटा का अनधिकृत उपयोग:
अटेंडेंस लगाने, फोटो अपलोड करने और विभागीय जानकारियों को सिंक करने में अच्छा-खासा इंटरनेट खर्च होता है। सरकार शिक्षकों को इसके लिए कोई डेटा रीचार्ज भत्ता नहीं देती। शिक्षकों के निजी पैसे से सरकारी काम कराने की यह नीति न्यायसंगत नहीं कही जा सकती।
5. अन्य विभागों से तुलना और दोयम दर्जे का व्यवहार
-
सिर्फ शिक्षकों पर ही यह नियम क्यों?
यह सवाल हर शिक्षक के मन में कसमसाता है कि जब पारदर्शिता की बात आती है, तो नियम सिर्फ स्कूल शिक्षा विभाग पर ही क्यों थोपे जाते हैं? कलेक्ट्रेट, तहसील, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग या अन्य बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालयों में इस तरह की कड़ाई क्यों नहीं की जाती? केवल शिक्षकों को इस तरह टारगेट करना उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को धूमिल करता है।
6. ग्रामीण स्कूलों का बुनियादी ढांचा (Infrastructure)
-
बिजली आपूर्ति और चार्जिंग का संकट:
सैकड़ों ग्रामीण प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल ऐसे हैं जहां आज भी नियमित बिजली नहीं है, या बारिश के दिनों में हफ्तों तक लाइट कटी रहती है। ऐसी स्थिति में मोबाइल डिस्चार्ज होने पर हाज़िरी कैसे लगेगी, इसका जवाब किसी अधिकारी के पास नहीं होता।
-
सरकारी वाई-फाई का न होना:
यदि सरकार को इस व्यवस्था को पूरी तरह फुलप्रूफ बनाना ही था, तो सबसे पहले हर स्कूल परिसर में सरकारी ब्रॉडबैंड या वाई-फाई की व्यवस्था करनी चाहिए थी, ताकि निजी नेटवर्क पर निर्भरता खत्म हो जाती।
7. डेटा गोपनीयता और प्राइवेसी का उल्लंघन
-
24 घंटे की लोकेशन ट्रैकिंग का डर:
कई ऐप्स बैकग्राउंड में चलते रहते हैं और शिक्षकों की प्राइवेसी यानी उनकी व्यक्तिगत लोकेशन को हर समय ट्रैक करते हैं। विशेषकर महिला शिक्षकों के लिए यह सुरक्षा और गोपनीयता के लिहाज से एक बड़ा चिंता का विषय है।
निष्कर्ष: समाधान क्या होना चाहिए?
शिक्षक संघ कभी भी अनुशासन या समय पर स्कूल आने का विरोधी नहीं है। विसंगति केवल इस व्यवस्था के लागू करने के अड़ियल ढर्रे से है। समाधान यह होना चाहिए कि जब तक शत-प्रतिशत स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं और नेटवर्क न पहुंच जाए, तब तक कागज़ी हाज़िरी रजिस्टर को ही मुख्य माना जाए। तकनीक का उपयोग केवल सहयोग के लिए होना चाहिए, न कि शिक्षकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और शिक्षा के मूल उद्देश्य को भटकाने के लिए।
